सलातुत तसबीह पढ़ने का तरीका - Asgar Ali Azhari

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Asgar Ali Azhari

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सलातुत तसबीह पढ़ने का तरीका



नफ़्ली नमाज़ें. 

फर्ज़ और वाजिब नमाज़ के अलावा पढ़ी जाने वाली सारी नमाज़ें नफ़्ल नमाज़ कहलाती हैँ । चूँ कि शरीअत के तारीफ़ के मुताबिक़ नफ़्ल से ज़ाइद चीज़ें समझी जाती है । और ये नमाज़ें भी ज़ाइद ही होती हैँ । अगर कोई आदमी इन नमाज़ों को पढ़ता है तो वो इन नमाज़ों की फ़ज़ीलत और ज़्यादा सवाब हासिल करेगा । और अगर कोई आदमी नहीं पढ़ता है तो वो इन नमाज़ों के बदले मिलने वाले सवाब और फ़ज़ीलत से महरूम रहता है । लेकिन उसको कोई भी गुनाह नहीं मिलता । नफ़्ल नमाज़ पढ़ने पर मिलने वाला सवाब और इन नमाज़ों की फ़ज़ीलत के तअल्लुक़ से क़ुरान मजीद और मुख़्तलिफ़ अहादीस ए तैयबा मेँ बहुत सारी जगह बयान किया गया है । इन नमाज़ों के तअल्लुक़ से मुख्तलिफ आयतें नाज़िल हुयी हैँ ।  अहादीस ए तैयबा मेँ कसरत से नफ़्ल नमाज़ पढ़ने पर फ़ज़ीलत वारिद हुयी हैँ । उन सारी फ़ज़ाइल मेँ से नफ़्ल नमाज़ पढ़ने की  एक अहम् और  मुनफ़रिद फ़ज़ीलत यह भी है कि क़ियामत के दिन जब किसी आदमी का नामा ए आमाल खोला जायगा अगर उसके नामा ए आमाल मेँ फ़राइज़ या वाजिबात मेँ कहीं कमी कमज़ोरी पायी गई तो उसके बदले इन नफ़्ल नमाज़ के ज़रिए उस के नामा ए आमाल को भर दिया जाएगा और वो जन्नत मेँ दाखिल किया जाएगा ।

सुब्हानल्लाह . 

इसी तरह एक और हदीस मेँ भी बयान किया जाता है कि.  जिस ने दिन और रात मेँ 12  रकअत नफ़्ल नमाज़ पढ़ा अल्लाह तआला उस के लिए जन्नत मेँ एक आलिशान घर तैयार करेगा ।
तो आइये हम लोग भी आज से खूब खूब नफ़ली नमाज़ पढ़े और ढेरों नेकियाँ कमाने कि कोशिश करें ।
उन्ही नफ़ली नमाज़ों मेँ से एक नमाज़ " सलातुत तसबीह " है । 

इस नमाज़ को सलातुत तसबीह क्यों कहते हैँ ??  

आइये जानते हैँ ।
इस नमाज़ को सलातुत तसबीह कहने कि बहुत सारी और वजूहात मेँ से एक वज्ह यह भी है कि इस नमाज़ के हर रकअत मेँ 75 मर्तबा यह तसबीह 

سبحان الله والحمدلله ولا إله الا الله والله اكبر 

( सुब्हानल्लाहि वल्हम्दु लिल्लाहि वला इलाह इल्लल्लाहु वल्लाहु अकबर ) पढ़ा जाता है । इसी वज्ह से इस नमाज़ को सलातुत तसबीह कहते हैँ ।

सलातुत तसबीह कि फ़ज़ीलत 

नफ़ली नमाज़ों मेँ सब से ज़्यादा फ़ज़ीलत वाली नमाज़ " तहज्जुद " के बाद इसी नमाज़ का नंबर आता है । इस नमाज़ कि बहुत सारी फ़ज़ाइल अहादीस मेँ बयान हुयी हैँ।
इस नमाज़ के तअल्लुक़ से सब से पहले खुद नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने 4 रकअत नमाज़ पढ़ी और अपने चचा हज़रत ए अब्बास रदियल्लाहु अन्हु को इस नमाज़ का पूरा तरीका सिखाया । और फ़रमाया ," ऐ चाचा जान ! इस नमाज़ को पढ़ने पर अल्लाह त आला आप के तमाम पिछले और आइंदा,  सगीरा और कबीरा,  नए और पुराने सारे गुनाह माफ़ फरमा देता है । अगर आप यह नमाज़ रोज़ाना पढ़ सकते हैँ तो रोज़ाना पढ़िए 
और अगर रोज़ाना नहीं पढ सकते हैँ तो एक हफते मेँ एक बार ज़रूर पढिए ।
 और अगर हफते मेँ भी नहीं पढ़ सकते तो महीने मेँ एक बार ,
 और अगर महीने मेँ एक बार भी नहीं पढ़ सकते हैँ तो साल मेँ एक बार ,
अगर साल मेँ भी एक बार पढ़ नहीं  सकते हैँ तो अपनी उम्र मेँ एक बार ज़रूर पढ़िए ।

                   ( सुनन अबू दाऊद. जिल्द 2 पेज नं 44 ) 

सलातुत तसबीह पढ़ने का तरीका 

सब से पहले और नमाज़ कि तरह पाक व सफाई हासिल कर के ( वुज़ू कर के ) सलातुत तसबीह कि नमाज़ कि नियत कर के हात बांध लीजिए ।  और दूसरी नमाज़ कि तरह हि सब से पहले सना पढ़ लीजिए ।सना पढ़ने के बाद 15 मर्तबा तसबीह यानी 
سبحان الله والحمدلله ولا إله الا الله والله اكبر 
( सुब्हानल्लाहि वल्हम्दु लिल्लाहि वला इलाह इल्लल्लाहु वल्लाहु अकबर ) पढ़ लीजिए ।
उसके बाद अउज़ू बिल्लाह और बिस्मिल्लाह पढ़ कर सूरह फातिहा और कोई दूसरी सूरत पढ़ लीजिए । सूरत पढ़ने के बाद फिर से ऊपर लिखी गयी तसबीह 10 मर्तबा पढ़ लीजिए और रूकू कर लीजिए ।
रुकू मेँ भी दीगर नमाज़ों कि तरह सुब्हान रब्बियल अज़ीम पढ़िए और उसको  पढ़ने के बाद फिर से 10 मर्तबा तसबीह पढ़ लीजिए ।
अब रुकू से उठ कर रब्बना लकल हम्द पढ़ कर फिर से 10 मर्तबा तसबीह पढ़ लीजिए । 
अब सजदा करने जाइए ।  सजदे मेँ भी सुब्हान रब्बियल आला पढ़ कर 10 मर्तबा वही तसबीह पढ़िए ।  
पहले सजदा से उठ कर जब बैठते हैँ तो उस वक़्त भी 10 मर्तबा तसबीह पढ़ लीजिए ।
अब दूसरे  सजदे मेँ भी सुब्हान रब्बियल आला पढ़ कर 10 मर्तबा वही तसबीह पढ़िए । अब दूसरे सजदे से उठ कर दूसरी रकअत के लिए खड़े हो जाइये ।
( इस तरह 1 रकअत मेँ कुल 75 मर्तबा तस्बीह पढ़ी जाएगी )
अब दूसरे तीसरे और चौथे रकअत मेँ भी सजदे से उठ कर शुरू मेँ 15 मर्तबा और सूरह फातिहा और कोई सूरत पढ़ कर 10 मर्तबा और बाकी पहले रकअत कि तरह हि पढ़नी है.  नतीजा के तौर पर हर रकअत मेँ 75 और 4 रकअत मेँ 300 मर्तबा तस्बीह पढ़ी जायेगी.  
चौथे रकअत मेँ सजदे से उठ कर अत्तहिय्यात पढ़िए और दीगर नमाज़ कि तरह नमाज़ मुकम्मल कीजिए और नमाज़ के बाद अपने लिए, अपने खानदान के लिए और सारे मुसलमानों के लिए दुआ ए खैर कीजिए.. 
( सवाब ए दारैन हासिल करने के लिए दूसरे लोगो तक भि पहुचाइए )