रमजान शरीफ के रोजों के जरूरी मसाईल ( Part-3 )
मोअज्जज कारिइने किराम !
पिछले पोस्ट मेँ हम ने रोजे के तअल्लुक से कुछ अहम और जरूरी मसायल का पहला हिस्सा पोस्ट किया था ! आज फिर हम उन्हिँ मसाइल मेँ से मजीद और भि मसाइल बयान करने जा रहे हैँ ।
36-मक्खी हल्क में चली गई तो रोजा नहीं टूटता।
37-भूल से खाना खा रहा था या पी रहा था याद आते ही फैंक दिया रोजा नहीं टूटा।
38-चुगली करने से रोजा नहीं टूटता लेकिन चुगली करना बहुत बड़ा गुनाह है जरुर बचना चाहिए।
39-तिल या तिल के बराबर कोई चीज चबाई ओर थूक के साथ निगल गया तो रोजा नहीं टूटता हां अगर जाइका महसूस हुआ तो रोजा टूट जाएगा।
40-सिगरेट गुटखा वगैरह पीने खाने से रोजा टूट जाता है।
41- पानी कान में चला गया तो रोजा नहीं टूटता।
42-आंसू या पसीने का कतरा मूंह में चला गया तो रोजा नहीं टूटता ज्यादा था तो टूट जाएगा।
43-यह गुमान किया कि अभी सहरी का समय है खा पी लिया बाद में पता चला कि समय खत्म हो गया था तो कजा वाजिब है।
45- मरीज ओर मुसाफिर को रोजा छोङने की इजाजत है।
46-बच्चे की उम्र दस साल की हो जाए उसमें रोजा रखने की ताकत है तो उससे रोजा रखवाया जाए।
47-रोजे की हालत में कुल्ली करने ओर नाक में पानी चङाने में ज्यादती से बचना चाहिए।
48-रोजे की हालत में ठंडक लेने के लिए मुंह में पानी रखना नाक में पानी चङाना स्नान करना गीला कपङा ओङना जाईज है ।
4-मुंह में थूक जमा करना फिर निगल जाना मकरूह है।
50-मरीज को मर्ज बढ जाने का या देर से ठीक होने का या तन्दरुस्त को बीमार होने का गालिब गुमान हो तो रोजा छोङ सकते हैं।
51- ओरत को माहवारी आई तो रोजा जाता रहा।
माहवारी वाली ओरत को छुप कर खाना पीना जरूरी नहीं है बल्कि आम दिनों की तरह खा पी सकती है।
52-सांप वगैरह ने काट लिया ओर जान जाने का डर हो तो रोजा तोङ दे।
53-एक आदमी की तरफ से दूसरा आदमी रोजा नहीं रख सकता।
54-ऐसा बुजुर्ग जो न रोजा रख सकता है और न ही आने वाली दिनों में रखने की उम्मीद है तो उस पर हर रोजे के बदले दोनों वक्त का एक मिस्कीन को खाना खिलाना वाजिब है या हर रोजे के बदले सदक ए फितर की मिकदार मिस्कीन को दे दे।
55- रमजान के महीने में रोजा छोङने का डर हो तो ज्यादा देर तक तकलीफ वाला काम नहीं करना चाहिए बल्कि हो सके तो जल्दी काम बन्द कर ले ताकि आराम कर सके बाकी रमजान शरीफ के महीने में काम करना मना नहीं है।
56- *नोट:-*
इसबार तो लोकडाउन है फिर भी अगर दो नम्बर लोग चदां लेने आ जाएं तो ईन को देना बिल्कुल जरूरी नहीं है
याद रखें मदरसे में जकात दो शर्तों के साथ जाईज है
*1-दीनी तालीम होती हो*
*2-उस मदरसे को पैसों की जरुरत हो।*
ईन दोनों शर्तों में से अगर एक भी न पाई जाए तो इनको जकात का पैसा देने की कोई जरूरत नहीं है बल्कि *कुरआने पाक में अल्लाह पाक ने जकात कहाँ खर्च करनी है बता दिया है*
*फकीरों ग़रीबों मिस्कीनों वगैरह के लिए जकात है इसलिए मेहरबानी करके उन का हक उन तक पहूचाएं*
अगर आप के पास ज्यादा पैसा नहीं है यानी आप मालिके निसाब नहीं है तो आप पर जकात वाजिब नहीं है ओर न ही आप पर चन्दा देना वाजिब है इसलिए ईहतीयात करें हां अगर सही लोग आएं तो जरूर मदद करें
*खुदा के वास्ते आप अपने गांव ओर पङोस में बैठे गरीबों मरीजों विधवाओं का ख्याल रखें जकात सदक ए फितर उनका हक है उन तक पहूचाएं*
यह जो रमजान के महीने में ढाङी रखकर बरसात के मैंढकों की तरह कुछ लोग निकल आते हैं और कहते हैं कि रसीद कटवा लो ओर जन्नत का टिकट ले लो तो याद रखें जन्नत इतनी सस्ती नहीं है।
ओर न ही कोई शलवार कुर्ता पहनने ओर ढाङी रखने से आलिम बनता है आलिम सिर्फ इल्म से बनता है अगर इल्म है तो कपडे चाहे कैसे ही पहने वह आलिम है।
57-तरावीह पढाते वक्त आराम से कुरआन शरीफ पढें कुछ लोगों को तो खुद पता नहीं चलता कि अल्हमदु के बाद वल्द्दालीन तक क्या पढ रहा है यह बिल्कुल हराम है कुरआने पाक के साथ मजाक बनाना है इससे बचें बाकी हर मुसलमान नमाज पढा सकता है।
58- रात में या सुबह सहरी के वक्त माईक में नअतें या तकरीरें लगाना मुनासिब नहीं है
अगर किसी को माईक की आवाज से ज्यादा तकलीफ होती है तो लगाना ना जाईज है।
